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शनिवार, 27 नवंबर 2010

ek bachche ki kahani

आओ बच्चों तुम्हे मिलाऊँ एक छोटे से बच्चे से,
कहना ना माने अपने बड़ों का ऐसे अक्ल के कच्चे से.
मम्मी-पापा बहुत रईस
देते उसे खूब पॉकेट मनी
अपने साथ के बच्चों में वो
बनता फिरता बहुत धनी
इधर-उधर के खर्चे करता जिन्हें ना करते अच्छे से, 
कहना ना माने अपने बड़ों का ऐसे अक्ल के कच्चे से.
पैसे के कारण उसे मिले कुछ
स्कूल में बच्चे बिगडेल
जिन की संगति में रह-रहकर
कर बैठा वो गंदे खेल
अपनी अक्ल पर चलकर ही तो भटक गया वो रस्ते से,
कहना ना माने अपने बड़ों का ऐसे अक्ल के कच्चे से.
देख के उसकी बुरी आदतें
स्कूल से घर पर शिकायत आई
पढ़ बेटे की गलत हरकतें
मात-पिता के मुख शर्म थी छाई
जाकर उसका कमरा देखा मिली अफीम थी बस्ते से,
कहना ना माने अपने बड़ों का ऐसे अक्ल के कच्चे से.
सुधार ही देंगे बेटा अपना
मम्मी-पापा ने सौगंध ली
बेटे के सामने खुद ही अपने
जीवन की सच्चाई खोली
मिलता है यहाँ सब कुछ बेटे काम करो जब मेहनत से,
कहना ना माने अपने बड़ों का ऐसे अक्ल के कच्चे से.
पैसा तुमको हम ना देंगे
मित्रो से जाकर ले लो
कहना हमारे बेटे नहीं हो
अब तुम मेरे संग खेलो
जाके कहा जब उसने ये सब दिया निकाल उसे दस्ते से,
कहना ना माने अपने बड़ों का ऐसे अक्ल के कच्चे से.
देख के उसकी बुद्धि संभली
उसने मन में ठान ली
मानेगा मम्मी-पापा की
बात ये उसने जान ली
कैसा लगा मिलकर अब बोलो इस छोटे से बच्चे से,
कहना भी माने करना भी जाने ऐसे मन के सच्चे से.

1 टिप्पणी:

चैतन्य शर्मा ने कहा…

बहुत अच्छा लगा शालिनी दी ....... कितनी अच्छी बात बताती कविता लिखी आपने..... थैंक यू