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मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

bachchon tum ho phool salone

आज मैं अपनी छोटी बहन शिखा की प्रेरणा से बनाये गए इस ब्लॉग पर लिख रही हूँ.मेरी बहन और मैं दोनों ही बच्चो से बहुत प्यार करते हैं लेकिन जैसे की मेरी बहन बच्चों से बहुत प्यार करने के कारण उनकी बहुत सी गलतियों को माफ़ कर देती है मैं नहीं कर पाती.आज के बच्चे बहुत होशियार हैं लेकिन अपने बड़ों की कुछ नासमझियों के कारण असभ्य भी होते जा रहे हैं और यही असभयता है जो मैं झेल नहीं पाती.मेरे पापा मम्मी ने हमेशा मुझे बड़ों का सम्मान करना सिखाया है.उन्होंने ये कभी नहीं चाह की हम बच्चे बैठ कर बड़ों की बातों में शामिल hon क्योंकि यह एक तथ्य hai की बच्चे बड़ों के साथ बैठ कर उनकी ही बातें सीखेंगे इसलिए बच्चों की मासूमियत को बचाने के लिए बड़ों का योगदान ज़रूरी है.इसलिए मैं पहले बड़ों से ही सहायता मांगती हूँ की वे बच्चों को बच्चा ही रहने दे.
 अब बच्चों आप से मैं जो पूछ रही हूँ उसका बच्चो खुद जवाब देना मम्मी या पापा से मत पूछना.अब बताओ...
१-क्या आपको बड़ों में बैठना उनसे बाते करना अच्छा. लगता है यदि हाँ तो क्यों?
२-आप बड़ों से क्या उम्मीद करते हो?
३-आप अपने मित्र स्वयं बनाते हो या पापा मम्मी से पूछकर बनाते हो?
४-क्या आप अपने मित्र की सब बाते घर में बताते हो?
५-क्या आप अपनी मित्रता की लड़ाई में मम्मी पापा की मदद लेते हो?यदि हाँ तो क्यों?यदि नहीं तो क्यों?
तुम्हारे जवाब के इंतजार में....

2 टिप्‍पणियां:

चैतन्य शर्मा ने कहा…

आपने तो बड़ी अच्छी बातें लिखी हैं......

मुझे तो सबसे ज्यादा बुरा लगता है जब कोई मुझे अजीब तरह के नाम से बुलाता है....

मेरे ब्लॉग पर मैंने इस बारे में लिखा भी है.... यानि ममा ने लिखा है...:)

shalini kaushik ने कहा…

chatanya ye blog banane me tumhara apoorve yogdan hai.tumhara blog dekhkar ise banane ki ichha hui.tumne mere prashno ke jawab nahi diye.kyon?kya mummy ne mana kiya ya khelne me bizi ho?jawab do aur khud do achha lagega.