

[गूगल से साभार ]
एक गिलहरी ..नाम था लहरी
चली घूमने मेले में .
संग सहेली ...करें ठिठोली
धूम मचाती मस्ती में .
माँ ने रोका .....उसको टोका
कहाँ चली तुम सर्दी में ?
सुनकर लहरी ...थोडा ठहरी
फिर वह बोली ..जल्दी में
टोपी-मफलर और स्वेटर
कौन पड़े झमेले में ?
ये कह माँ से ...निकली घर से
पहुंची फिर वह मेले में .
मेला घूमा ...झूला-झूला
लिए खिलौने थैले में .
फिर घर पहुंची ...जोर से छीकी
घुस गयी जाकर बिस्तर में .
माँ ने सिर पर हाथ फिराया
काढ़ा उसको गर्म पिलाया
खो गयी फिर वह सपनों में .
सारी सर्दी दूर थी भागी
लहरी ने फिर माफ़ी मांगी
फिर वह उछली ..घर भर में .
एक गिलहरी ...नाम था लहरी .
शिखा कौशिक
5 टिप्पणियां:
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (18-03-2015) को "मायूसियाँ इन्सान को रहने नहीं देती" (चर्चा अंक - 1921) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
ek gilhari sundar baal geet hai dhanyabad
अच्छी रचना
बहुत ही प्यारी रचना है
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