नहीं टालते बात बड़ों की
बारिश के दिन शुरू हुए थे
टर्र टर्र टर्रराता था ;
टिंकू मेढक उछल-उछल कर
अपने पर इतराता था .
उसकी मम्मी उसे रोकती
उनपर वो चिल्लाता था ;
मम्मी की इस रोक-टोक पर
उसको गुस्सा आता था ,
मम्मी कहती गीली मिटटी
कहीं फिसल न तुम जाना !
टिंकू कहता बड़ा अकड़कर
क्या मुझको बुद्धू माना ?
लेकिन एक दिन खेल-खेल में
टिंकू गिरा फिसलकर था ;
चोट लगी और दर्द हुआ
तब रोया खूब फफक कर था ,
मम्मी ने फिर गोद बिठाकर
प्यार से सिर को सहलाया ;
नहीं टालते बात बड़ो की
बड़े लाड़ से समझाया ,
टिंकू ने फिर कान पकड़कर
मम्मी से ये बात कही
आज समझ में आया मुझको
गलत था मैं और आप सही .
शिखा कौशिक
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